गायत्री मंत्र
सूर्य के प्रकाश की वैदिक प्रार्थना, ऋग्वेद से। मंत्र, उसका अर्थ, और जप की परंपरा।
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥
अर्थ
हम उस सविता देव के श्रेष्ठ तेज का ध्यान करते हैं, जो भू, भुवः और स्वः — तीनों लोकों में व्याप्त है; वह तेज हमारी बुद्धि को प्रेरित करे। यह किसी वस्तु की नहीं, स्पष्ट बुद्धि की प्रार्थना है। इसीलिए इसे विद्यार्थियों को दिया जाता है और अध्ययन के आरंभ में पढ़ा जाता है।
जप की विधि
परंपरा से प्रातः, मध्याह्न और संध्या — तीनों समय; प्रातः पूर्व की ओर और संध्या पश्चिम की ओर मुख करके, रुद्राक्ष या तुलसी माला पर 108 की संख्या में। बहुत लोग सूर्योदय पर ग्यारह बार जप करते हैं — संख्या से अधिक महत्व निरंतरता का है।
कहां प्रयोग होता है
निर्बल सूर्य, ग्रहण दोष, और परीक्षा से पहले मन की स्थिरता — इन सबके लिए यह पहला उपाय है। आज इसके जप का अधिकार सबको है।
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